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Thursday, 1 January 2026

रिक्तता नहीं, संस्कार भरिए

 रिक्तता नहीं, संस्कार भरिए


विनोद विन्ध्येश्वरी प्रसाद पाण्डेय



अनूपपुर । हर समाज की पहचान उसके संस्कार, उत्सव और जीवन-दृष्टि से होती है। जब कोई समाज अपने मूल उत्सवों से कटने लगता है, तब उसकी सांस्कृतिक चेतना में शून्य पैदा हो जाता है। यही शून्य धीरे-धीरे बाहरी परंपराओं के लिए द्वार खोल देता है। आज हिन्दू समाज के सामने यही प्रश्न खड़ा है कि हम अपनी पहचान से दूर क्यों होते जा रहे हैं और समाधान कहाँ है।हम क्रिश्चियन नहीं हैं, फिर भी क्रिश्चियन नववर्ष को बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह प्रश्न किसी समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए है। समस्या यह नहीं है कि हम क्या मना रहे हैं, समस्या यह है कि हम क्या छोड़ चुके हैं।कहावत है कि प्रकृति को रिक्तता नहीं भाती। जहाँ शून्य होता है, वहाँ कुछ न कुछ अवश्य भर जाता है। आज का हिन्दू समाज इसी रिक्तता से जूझ रहा है। हमारी विद्वन्मण्डली और समाज दोनों ने समय के साथ अपने पारंपरिक उत्सवों से दूरी बना ली। परिणामस्वरूप, जिन पर्वों ने कभी हमारे जीवन को दिशा, संतुलन और सामाजिक एकता दी थी, उनके स्थान पर अन्य परंपराएँ स्वाभाविक रूप से प्रवेश कर गईं।उत्तरायणारम्भ इसका स्पष्ट उदाहरण है। सूर्य के उत्तरायण होने का वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व हमारे शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णित है, पर समाज को इसे मनाने की प्रेरणा मिलनी लगभग बंद हो गई। भ्रम यह भी फैला कि मकर-संक्रांति पर ही उत्तरायण होता है, जबकि वास्तविक उत्तरायणारम्भ 22 दिसंबर को होता है। जब मूल तिथि और उसका भाव ही विस्मृत हो जाए, तो रिक्तता तो बनेगी ही, और वही रिक्तता क्रिश्चियन नववर्ष जैसे उत्सवों से भर दी जाएगी।

यही स्थिति मदन महोत्सव की रही। कभी चैत्र नवरात्र में यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक उत्सव होता था। इसमें विवाहेच्छु युवक और युवतियाँ संस्कारित, मर्यादित और पारिवारिक वातावरण में एक-दूसरे को जानने और चुनने का अवसर पाते थे। युवक अपने कौशल, योग्यता और चरित्र का प्रदर्शन करते थे, और नवयुवतियाँ अपने अभीष्ट वर का वरण करती थीं। चैत्र शुक्ल अष्टमी को सप्तपदी के साथ पाणिग्रहण होता था। यह केवल विवाह नहीं था, बल्कि समाज को सुदृढ़, संतुलित और नैतिक आधार देने की एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया थी। हमने इस परंपरा को छोड़ दिया और परिणामस्वरूप वैलेंटाइन डे ने उस रिक्त स्थान को भर लिया।सच्चाई यह है कि जब हम अपने उत्सव छोड़ देते हैं, तब कोई और आकर वह स्थान ले लेता है। बाद में उसे विजातीय, अनुचित या असंस्कृत कहने से कुछ नहीं बदलता, क्योंकि वास्तविक भूल विरोध में नहीं, बल्कि उपेक्षा में होती है। रिक्तता हमने छोड़ी, और उसे भरने वाला कोई और आ गया।मनुष्य स्वभाव से उत्सवप्रिय है। हमारे पूर्वज इस सत्य को गहराई से समझते थे। इसी कारण सनातन परंपरा में वर्ष भर उत्सवों की एक सशक्त श्रृंखला रची गई, जो केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि जीवन में अनुशासन, संस्कार, ऋतु बोध और सामाजिक एकता स्थापित करने के लिए थी।समाधान विरोध में नहीं, पुनर्जागरण में है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पर्वों को केवल रस्म न समझें, बल्कि उनके पीछे छिपे तत्त्व, तिथियाँ, भाव और उद्देश्य को जानें। उन्हें घर-घर, समाज-समाज और नई पीढ़ी तक पुनः जीवित करें। जब हम स्वयं अपने उत्सव पूरे भाव, गर्व और समझ के साथ मनाएँगे, तब किसी विजातीय परंपरा के लिए स्थान स्वतः समाप्त हो जाएगा।


रिक्तता मत छोड़िए।संस्कार भरिए।

यही सनातन की सच्ची रक्षा है।

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