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Sunday, 4 January 2026

हरद, पसान और कोतमा के हवाओं में धीमा जहर का बहाव

 हरद पसान एवं कोतमा की हवा में घुल रहा ‘धीमा जहर’, मोजर बियर व उद्योगों की राख से बढ़ा प्रदूषण



सांस लेना हुआ मुश्किल, बच्चों-बुजुर्गों की सेहत पर सीधा असर

संस्कार गौतम - अनूपपुर

जिले के जैतहरी क्षेत्र में स्थित मोजर बेयर (हिंदुस्तान पावर) और आसपास के औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली राख अब ग्राम पंचायत हरद पसान सहित पूरे इलाके के लिए गंभीर संकट बनती जा रही है। खुले में उड़ती राख ने अनूपपुर, कोतमा और पसान की हवा को प्रदूषित कर दिया है। हालात यह हैं कि लोगों के लिए खुले में सांस लेना भी मुश्किल होता जा रहा है।

सफेद राख, काला भविष्य

स्थानीय ग्रामीणों एवं नगरवासियों का कहना है कि राख की महीन परत घरों की छतों, खेतों और सड़कों पर जम रही है। हवा के साथ यह राख सीधे फेफड़ों में जा रही है। बच्चों में लगातार खांसी-जुकाम, आंखों में जलन और सांस संबंधी दिक्कतें बढ़ी हैं, वहीं बुजुर्गों और दमा-एलर्जी के मरीजों की परेशानी कई गुना बढ़ गई है।

नियमों की अनदेखी का आरोप

ग्रामीणों एवं नगरवासियों का आरोप है कि उद्योग प्रबंधन द्वारा राख का सुरक्षित और वैज्ञानिक निस्तारण नहीं किया जा रहा। खुले डंपिंग यार्ड, पर्याप्त पानी छिड़काव और कवरिंग की व्यवस्था न होने से राख उड़कर आबादी तक पहुंच रही है। पर्यावरणीय मानकों का पालन केवल कागजों तक सीमित बताया जा रहा है।

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े विभाग और स्थानीय प्रशासन इस गंभीर समस्या पर मौन क्यों हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में हालात और भयावह हो सकते हैं।

विकास चाहिए, विनाश नहीं

स्थानीय नागरिकों का साफ कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन स्वास्थ्य और पर्यावरण की कीमत पर विकास स्वीकार्य नहीं। उन्होंने प्रशासन और कंपनी प्रबंधन से राख के सुरक्षित निस्तारण, प्रदूषण नियंत्रण उपायों की सख्त निगरानी और प्रभावित लोगों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच की मांग की है। क्या जिम्मेदार विभाग समय रहते जागेंगे, या ग्राम पंचायत हरद और आसपास का इलाका यूं ही ‘धीमे जहर’ की चपेट में रहता रहेगा?


क्या कहता है नियम?

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) की 'फ्लाई ऐश नोटिफिकेशन' के अनुसार:

100% उपयोग: थर्मल पावर प्लांट्स को अपनी राख का 100% उपयोग ईंट बनाने, सड़क निर्माण या सीमेंट फैक्ट्रियों में करना अनिवार्य है। 

वैज्ञानिक डंपिंग: अगर राख डंप की जा रही है, तो उसे गीली अवस्था  में या कवर्ड डंपर्स के जरिए ले जाना चाहिए ताकि वह हवा में न उड़े।

वॉटर स्प्रिंकलिंग: राख के ढेरों पर लगातार पानी का छिड़काव होना चाहिए और उन पर हरियाली  विकसित की जानी चाहिए। हकीकत क्या है? खुले ट्रकों में उड़ती राख, सड़कों पर जमी सफेद परत और सांसों के जरिए हमारे शरीर में जाता सिलिका और भारी धातुएं! यह स्थिति एनजीटी  के उन आदेशों की सरेआम अवहेलना है जो कहते हैं कि 'प्रदूषण फैलाने वाला ही हर्जाना भरेगा'।




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